मकर संक्रांति का पावन पर्व वाराणसी में भव्य रूप धारण कर चुका था। गंगा के किनारे बसे घाटों पर लाखों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। यह त्योहार फसलोत्सव के साथ-साथ सूर्य देव की उत्तरायण यात्रा का प्रतीक है, जिसे भक्त पूरे उत्साह से मनाते हैं।
रविदास घाट से लेकर चितसिंह घाट तक हर जगह स्नान और पूजा का दौर चलता रहा। महिलाओं ने पीले वस्त्र धारण कर गंगा में डुबकी लगाई, जबकि पुरुषों ने पितरों के लिए तर्पण किया। तिल-गुड़ के लड्डू बहते हुए नजर आए, जो कल्याण का संदेश देते हैं।
दोपहर में पतंग उड़ाने की होड़ लग गई। आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से पट गया, युवाओं में उत्साह की लहर दौड़ गई। मंदिरों में भजन-कीर्तन गूंजे और प्रसाद वितरण हुआ। स्ट्रीट फूड स्टॉल्स पर खिचड़ी की चहल-पहल रही।
जिला प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष योजना बनाई थी। लाइफगार्ड और सीसीटीवी की मदद से सब नियंत्रित रहा। रात्रि में आरती का नजारा मनमोहक था, जब हजारों दीये गंगा को निहारते हुए प्रज्वलित हुए। यह पर्व वाराणसी की सनातन परंपराओं को जीवंत रखता है।