हिंदू पंचांग में स्नान के ये पांच तिथियां आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। सर्दी की मकर संक्रांति से शरद की कार्तिक पूर्णिमा तक, हर स्नान की अपनी कथा और महत्व है।
मकर संक्रांति पर गंगा सागर में संगम स्नान होता है। सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करता है, भक्त पवित्र जल में उतरकर वर्षा ऋतु की कामना करते हैं। आकाश में पतंगें उड़तीं, धरती पर भजन गूंजते।
महाशिवरात्रि की रात्रि भक्ति में बीतती है, सुबह क्षिप्रा या गंगा स्नान से। महाकाल मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, शिवलिंग पर जल अर्पित कर पापमुक्ति पाते हैं।
कुंभ का शाही स्नान विश्व विख्यात है। नासिक, उज्जैन, हरिद्वार, प्रयाग में घूम-घूम कर आता यह मेला समुद्र मंथन की स्मृति जगाता है। साधु संतों के डुबकी लगाते ही पर्व शुरू हो जाता।
रथ यात्रा से पहले पुरी में स्नान यात्रा का आयोजन होता है। हर्बल जल से भगवान जगन्नाथ का अभिषेक दर्शन का दुर्लभ अवसर है। फेना (स्नान जल) घर ले जाकर चमत्कार की आशा की जाती।
कार्तिक पूर्णिमा को गोवर्धन या मणिकर्णिका घाटों पर चंद्र स्नान श्रेष्ठ माना जाता। आरती और भंडारे के बीच यह स्नान गुरु कृपा और वैकुंठ प्राप्ति का द्वार खोलता है।
इन स्नानों से भारतीय संस्कृति की विविधता झलकती है, जो एकता का सूत्र बांधती है। आधुनिक युग में भी इनकी प्रासंगिकता अटल है।