कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने केंद्र सरकार द्वारा जाति आधारित जनगणना की घोषणा का भव्य स्वागत किया है। उन्होंने इसे ‘सामाजिक समानता का नया अध्याय’ करार देते हुए कहा कि इससे नीतियां अधिक प्रभावी होंगी।
यह फैसला वर्षों की राजनीतिक लड़ाई का परिणाम है। विपक्ष की लगातार मांग के बाद सरकार ने रुख मोड़ लिया। टैगोर ने बधाई देते हुए जोर दिया कि सटीक आंकड़ों के बिना पिछड़ों का उत्थान संभव नहीं।
जनगणना में जाति के साथ आर्थिक स्थिति भी दर्ज होगी, जिससे योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, ओबीसी आबादी के सही आंकड़े आरक्षण बहस को नई दिशा देंगे।
पिछली बार 1931 में ब्रिटिश काल में ऐसा हुआ था। स्वतंत्र भारत में पहली बार पूर्ण प्रयास हो रहा है। महामारी से विलंबित सामान्य जनगणना के साथ यह एकीकृत होगी।
राज्यों में जाति समीकरण बदल सकते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में इसका बड़ा प्रभाव पड़ेगा। टैगोर ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने पर बल दिया।
चुनौतियां कम नहीं हैं—तकनीकी जटिलताएं, प्रशिक्षण और सामाजिक संवेदनशीलता। फिर भी, टैगोर का उत्साह विपक्ष की सकारात्मक भूमिका दर्शाता है।
यह कदम भारत को डेटा संचालित लोकतंत्र की ओर ले जाएगा, जहां हर वर्ग को उसका हक मिल सकेगा। राजनीति में यह एक दुर्लभ एकजुटता का प्रतीक है।