एस जयशंकर की कहानी प्रेरणादायक है—मनमोहन सिंह के चहेते, जिन्हें कांग्रेस ने कभी तवज्जो न दी, लेकिन पीएम मोदी ने 2019 में बिना चुनाव के विदेश मंत्री पद सौंपा। यह फैसला भारतीय राजनीति में मील का पत्थर साबित हुआ।
आईएफएस अधिकारी के रूप में जयशंकर ने मॉस्को से वॉशिंगटन तक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। 2009 में सिंह ने उन्हें विदेश सचिव बनाने का समर्थन किया, लेकिन पार्टी हाईकमान ने नकार दिया। जयशंकर फिर भी चमके—चीन में राजदूत रहते हुए वुहान शिखर सम्मेलन संभाला।
मोदी के नेतृत्व में उनका प्रवेश गेम-चेंजर रहा। राज्यसभा के रास्ते मंत्रिमंडल में शामिल होकर उन्होंने अफगानिस्तान संकट से लेकर रूस-यूक्रेन युद्ध तक हर चुनौती का सामना किया। गलवान घाटी विवाद में चीन को आईना दिखाया, मध्य पूर्व में नए गलियारों का निर्माण किया।
उनकी वाक्पटुता और तथ्यपरक बहसें संसद से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक विपक्ष को चुनौती देती हैं। कांग्रेस का पुराना निर्णय अब पछतावे का विषय लगता है, जबकि मोदी का भरोसा सही साबित हुआ।
जयशंकर के नेतृत्व में भारत ‘विश्व गुरु’ बनने की राह पर है। उनकी यात्रा सिद्ध करती है कि क्षमता ही अंतिम मापदंड है, न कि राजनैतिक पृष्ठभूमि। आने वाले समय में उनका योगदान और भी यादगार होगा।