यादों के पन्नों में बसे हैं नोबेल विजेता हरगोविंद खुराना, जिनका मानना था कि इतिहास साधनों से नहीं, संकल्प से बनता है। भारतीय मूल के इस वैज्ञानिक ने जीन की दुनिया में अभूतपूर्व कार्य किया।
गरीब किसान परिवार में पले खुराना ने कठिनाइयों को पार किया। स्कूल दूर था, बिजली नहीं, फिर भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन से विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाया। ज्यूरिख और शिकागो में रिसर्च ने उन्हें पहचान दिलाई।
नोबेल समिति ने 1968 में उनके डीएनए-आरएनए कार्य के लिए सम्मानित किया। कृत्रिम जीन संश्लेषण ने दवाओं से लेकर वैक्सीन तक का मार्ग प्रशस्त किया। एमआईटी में उन्होंने सैकड़ों छात्रों को प्रशिक्षित किया।
पद्म विभूषण और अन्य पुरस्कारों से नवाजे गए खुराना ने हमेशा मौलिक अनुसंधान पर बल दिया। उनका जीवन संदेश स्पष्ट है – इच्छाशक्ति से कोई लक्ष्य असंभव नहीं। भारत के वैज्ञानिक परिदृश्य में उनकी विरासत चमक रही है, नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करती हुई।