केशव चंद्र सेन का नाम लेते ही 19वीं सदी का वह दौर याद आता है जब भारत के युवा संतों ने धर्म और समाज को नई दिशा दी। ‘ब्रह्मानंद’ के नाम से प्रसिद्ध सेन ने न केवल ब्रह्म समाज को मजबूत किया, बल्कि भारतीय संस्कृति को सात समुद्र पार ले गए।
कलकत्ता में 1838 ई. में जन्मे सेन ने किशोरावस्था में ही ब्रह्म समाज का दामन थामा। उन्होंने हिंदू धर्म की कुरीतियों पर सीधा प्रहार किया—जातिवाद, मूर्तिपूजा और स्त्री अत्याचार। उनके प्रवचनों से जनता झूम उठती। उन्होंने बालिकाओं के लिए स्कूल खोले और श्रमिकों के लिए रात्रि शिक्षा का प्रबंध किया।
1866 और 1870 की इंग्लैंड यात्राएं ऐतिहासिक रहीं। लंदन की सभाओं में उन्होंने पूर्वी रहस्यवाद को पश्चिमी तर्क से जोड़ा। रानी विक्टोरिया उनके समर्थक बनीं। भारत में लौटकर उन्होंने प्रगतिशील ब्रह्म समाज बनाया। भारतीय सुधार संघ की स्थापना कर विवाह कानूनों में बदलाव लाए।
नव विधान उनका सबसे बड़ा प्रयोग था—ईसाई, इस्लाम, बौद्ध और हिंदू तत्वों का मिश्रण। लेकिन पारिवारिक विवादों ने उनकी छवि प्रभावित की। 1884 में असमय निधन के बावजूद, उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। ब्रह्म मिशनों से लेकर महिला सशक्तिकरण तक, सेन का प्रभाव सर्वव्यापी है। वे साबित करते हैं कि आध्यात्मिक ज्योति अंधेरे को पार कर जाती है।