71 वर्षीय अभिनेता रॉबर्ट कैराडाइन ने आत्महत्या कर ली। परिवार ने बताया कि बाइपोलर डिसऑर्डर ने उनकी जिंदगी तबाह कर दी थी। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, वैश्विक स्तर पर 37 मिलियन लोग इस मूड डिसऑर्डर का शिकार हैं, जो 0.5 फीसदी आबादी को चपेट में लेता है।
यह विकार मूड को चरम पर ले जाता है। मैनिया फेज में असीम ऊर्जा, खुशी का अतिरेक, तेजी से बातें, कम नींद और खतरनाक हरकतें होती हैं। हाइपोमेनिया में भी जोश छलकता है। अवसाद में निराशा, ऊर्जा की कमी, भूख-नींद बिगड़ना, खुद को दोषी ठहराना और सुसाइडल विचार हावी हो जाते हैं।
कामकाजी युवाओं में ज्यादा देखा जाता है, लिंग भेदभाव नहीं। गलत निदान से इलाज टलता है, कलंक से मदद नहीं मांगते। नतीजा – रिश्ते टूटते, नौकरी जाती, नशा चढ़ता और शारीरिक बीमारियां घेरती हैं। आत्महत्या का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
डब्ल्यूएचओ सलाह देता है – दवाओं से शुरुआत करें। लिथियम, वैल्प्रोएट जैसे स्टेबलाइजर एपिसोड रोकते हैं। एंटीसाइकोटिक्स सहायक। मनोचिकित्सा से सोच बदलती है, परिवारिक थेरेपी समर्थन देती।
जीवनशैली सुधारें – रोज व्यायाम, फिक्स्ड स्लीप, हेल्दी डाइट, मेडिटेशन। दोस्त-रिश्तेदारों का साथ और सपोर्ट ग्रुप्स ताकत देते हैं। कलंक हटाकर इलाज सुलभ बनाएं। कैराडाइन जैसी त्रासदियां रोकने के लिए अब जागें, मानसिक स्वास्थ्य को महत्व दें। पूरी तरह ठीक होना संभव है।