विश्व महिला दिवस के मौके पर भंसाली की फिल्में नारीवाद की मिसाल हैं। उनके निर्देशन में महिलाएं कभी पृष्ठभूमि में नहीं रहीं, बल्कि कहानी की धुरी बनीं।
मां की कठिनाइयों ने उन्हें प्रेरित किया—पैसे के लिए छोटे स्टेज पर डांस। इसके जवाब में उन्होंने भव्य लोकेशन और बारीक डिजाइन से भरपूर दुनिया रची। किरदार इतने जीवंत हैं कि दर्शक खो जाते हैं।
मनीषा की ऐनी ‘खामोशी’ में माता-पिता की सेवा को प्राथमिकता देती है। ऐश्वर्या की नंदिनी ‘हम दिल दे चुके सनम’ में चुलबुली लेकिन दृढ़, शादी के बाद भी प्रेम की राह चुनती है। रानी का ‘ब्लैक’ वाला रोल चुनौतियों से भरा था।
दीपिका की मस्तानी ‘बाजीराव मस्तानी’ में प्रेम के लिए लड़ती है, काशीबाई परिवार निभाती है। ‘पद्मावत’ में पद्मावती जौहर तक शौर्य दिखाती है। गंगूबाई आलिया के हाथों दलदल में कमल बनी। ‘हीरामंडी’ में हर तवायफ अपनी ताकत से चमकती है।
ये पात्र साबित करते हैं कि भंसाली ने सिनेमा में महिलाओं का नया अध्याय लिखा है।