8 मार्च का दिन महिलाओं के सम्मान के साथ साहिर लुधियानवी की याद दिलाता है, जिनकी शायरी ने हिंदी फिल्मों को अमर बना दिया। पंजाब के लुधियाना में 1921 ई. में पैदा हुए साहिर ने समाज के हर रंग को शब्दों में उतारा। उनकी सबसे हृदयस्पर्शी घटना तब घटी जब ‘नील कमल’ के गीत पर मोहम्मद रफी भावविभोर हो उठे।
रवि ने बताया, ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ की रिहर्सल में साहिर के बोल इतने गहरे थे कि रफी साहब फफक पड़े। वजह? बेटी की ताजा सगाई। पिता की दुआओं वाला गाना उनकी वास्तविकता बन गया। रवि हैरान, लेकिन रिकॉर्डिंग में वही सच्चाई कैद हो गई।
रफी ने पारिश्रमिक ठुकराया, शादी छोड़ी। गाना अवॉर्डस्वरूप चमका और विदाई का पर्याय बन गया। साहिर बहुमुखी थे- ‘खाली डब्बा…’ से खोखलेपन पर चोट की। ‘इंसान बनेगा’ से भाईचारा सिखाया।
मूडी लेकिन प्रतिभाशाली, साहिर क्रेडिट बांटते। उनकी विरासत आज भी जीवंत है।