जब समाज महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित रखना चाहता था, तब गंगूबाई हंगल ने अपनी गूंजदार आवाज से आकाश छुआ। धारवाड़ के साधन परिवार में 5 मार्च 1913 को जन्मीं इस दिग्गज ने हर बाधा को पार किया। उनकी जयंती पर विशेष।
मां की संगीत शिक्षा और सवाई गंधर्व के सान्निध्य में 13 साल की उम्र से तपस्या शुरू की। ‘गानेवाली’ जैसे तानों का सामना किया, लेकिन हार न मानी। उनकी स्थिर, गहरी स्वर लहरियां श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देतीं।
मुंबई के गणेश उत्सवों से ऑल इंडिया रेडियो तक, भक्ति गीतों से शुद्ध रागों तक – उनका सफर प्रेरणा स्रोत है। किराना शैली को समृद्ध किया।
पद्म पुरस्कार, अकादमी सम्मान, कर्नाटक विश्वविद्यालय, डाक टिकट – इनसे नवाजी गईं। निजी जीवन की त्रासदियां – जल्दी विधवा होना, पुत्री की असमय मृत्यु – झेलीं, फिर भी 75 वर्ष संगीत सेवा की। 2006 में विदाई संगीत सभा, 2009 में 97 की उम्र में अलविदा।
गंगूबाई हंगल सिद्ध करती हैं कि सच्ची कला जाति-पात, लिंग भेद मिटाती है। उनकी धुनें अनंत काल तक गूंजेंगी।