रवि—वह नाम जो हिंदी सिनेमा के संगीत को अविस्मरणीय बनाने का पर्याय है। दिल्ली में 1926 के जन्मे रवि शंकर शर्मा ने पिता के भजनों से सुर सीखे, बिना किसी गुरुकुल के। हारमोनियम से शुरुआत, अनेक बाजों पर कमाल। आर्थिक तंगी में इलेक्ट्रीशियन का काम, लेकिन संगीत की राह नहीं छोड़ी।
1950, मुंबई पहुंचे प्लेबैक के ख्वाबों संग। कठोर सच्चाई: स्टूडियो के चक्कर, मलाड स्टेशन पर सोना। दो साल की जद्दोजहद के बाद 1952 में हेमंत कुमार का साथ, ‘आनंदमठ’ कोरस से उड़ान भरी।
‘अलबेली’ (1955) निर्देशन डेब्यू। फिर ‘नई राहें’, ‘पहली रात’, ‘चौदहवीं का चांद’, ‘घराना’, ‘प्यार का सागर’, ‘चाइना टाउन’—सबकी धुनें दिलों पर राज। उनका फॉर्मूला अनोखा: बोल पहले, फिर लय। 1960 में फिल्मफेयर नामांकन।
‘आज और कल’, ‘गुमराह’, ‘शहनाई’, ‘नील कमल’, ‘हमराज’ समेत 50+ फिल्में। 1970-82 विराम, ‘निकाह’ से वापसी। मलयालम में ‘बॉम्बे रवि’ के नाम से योगदान। पुरस्कारों से नवाजे गए। महेंद्र कपूर की आवाज को अमर किया। 7 मार्च 2012 को दुनिया से विदा, मगर संगीत में बसे हैं हमेशा।