पांच दशक पुरानी संगीत साधना के योद्धा हरिहरन ने खास बातचीत में अपनी कहानी बयां की। गजल से फ्यूजन तक, मौलिकता न छोड़ी। रहमान से रिश्ते, नया एल्बम और बहुभाषी सफर पर चर्चा।
बचपन से संगीत घर की रगों में बसा। ‘फिल्मी दुनिया में मुश्किल हुई, लेकिन अपनी स्टाइल नहीं बदली। नकल से दूर रही आवाज।’
रहमान संग काम: ‘एक ही मंच पर दो दोस्त। उनके नए विचारों को ग्रहण कर आत्मा का पुट दें। प्रेरणादायी अनुभव।’
गजल की वर्तमान दशा: ‘इंस्टेंट कल्चर में उसे आधुनिक बनाएं। ‘जान मेरी’ में पारंपरिक गजल को बोसा नोवा रिदम से फ्यूज किया-‘गजल-नोवा’।’
कॉलोनियल कजिन्स का जमाना याद किया। ‘लेस्ली से संगीत पर बातें जारी। ईमानदार फ्यूजन ही भविष्य है।’
दस से अधिक भाषाओं का जादू: ‘हरेक की ऊर्जा अलग। शब्दों के पीछे के ख्याल समझें। सफर यादों का संग्रह, सफलता का बोझ न उठाया, जिज्ञासा आज भी वही।’