इंदीवर के गीतों में जनमानस की धड़कन बसती थी। प्रेम, पीड़ा, राष्ट्रभक्ति और ग्रामीण जीवन का सार उनकी सरल भाषा में उभरता। 40 वर्षों में 300+ फिल्मों के 1000+ गीत लिखे, जो दिलों में बसे हैं। हिंदी-उर्दू के सहज मिश्रण ने उन्हें ‘जनता के गीतकार’ बनाया।
बचपन से कविता रचने वाले श्यामलाल ‘आजाद’ राय ने स्वतंत्रता आंदोलन में जोशीले गीत लिखे, जेल की हवा खाई। मान्यता मिलने में देरी हुई। मुंबई आकर कठिनाइयों से लड़े। फारसी शब्द छोड़ हिंदुस्तानी अपनाई—’जनता की भाषा ही राज है।’
‘मल्हार’ के गीत की घटना यादगार। ‘प्यार की दुनिया में ये पहला कदम’ में ‘पतवार की दरकार नहीं’ लिखा। कल्याणजी ने समझाया—’दरकार’ यानी ‘आवश्यक’, अतः ‘पतवार भी दरकार नहीं’। इंदीवर ने विरोध किया, किंतु स्वीकारा। यह संवाद उनकी कला को निखारा।
कल्याणजी-आनंदजी के साथ ‘उपकार’ का ‘कसमें वादे’, ‘करन अर्जुन’ जैसे सफल। उर्दूप्रधान दौर में हिंदी को प्रमुखता दी। ‘आप जैसा कोई’ आज भी चहेता। इंदीवर का संदेश साफ—सादगी से ही गीत अमर होते हैं।