बॉलीवुड के दिग्गज निर्देशक प्रकाश झा की जिंदगी में एक डॉक्यूमेंट्री ने तूफान ला दिया। ‘फेस आफ्टर द स्टॉर्म’ ने 1981 के नालंदा दंगों को न सिर्फ कैमरे में कैद किया, बल्कि झा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। यह फिल्म उनके करियर का आधार स्तंभ बनी।
झा ने फिल्म में दंगों के पीछे की जड़ों को खंगाला। ग्रामीणों की आपबीती सुनकर उन्होंने दिखाया कि हिंसा कैसे सामान्य जीवन को तबाह कर देती है। सामाजिक कलह, धार्मिक उन्माद और गरीबी जैसे मुद्दों ने लोगों को हिंसक बना दिया। फिल्म का संदेश साफ था—हिंसा सबको निगल जाती है, चाहे कोई भी वर्ग हो।
फिल्म बनाना आसान नहीं था। युवा झा, जो कभी पेंटिंग की दुनिया में थे, ने सीमित साधनों से यह कमाल किया। खतरनाक माहौल में घुसकर उन्होंने सच्चाई कैद की, जो आज भी प्रासंगिक है।
राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने पर झा रातोंरात चर्चा में आ गए। इसने उन्हें मुख्यधारा सिनेमा की ओर मोड़ा। ‘हिप हिप हुर्रे’ से शुरुआत कर उन्होंने ‘परिणति’, ‘मृत्युदंड’, ‘दिल क्या करे’, ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’, ‘राजनीति’, ‘आरक्षण’, ‘चक्रव्यूह’, ‘सत्याग्रह’, ‘जय गंगाजल’, ‘परीक्षा’, ‘खोया खोया चांद’ और ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्खा’ जैसी हिट फिल्में दीं।
झा की फेहरिस्त लंबी है और उनका जुनून बरकरार। यह डॉक्यूमेंट्री सिद्ध करती है कि सच्ची कला हमेशा जीतती है।