मुंबई की फिल्म नगरी में किस्मत के उलटफेर की कहानियां कम नहीं हैं। डैनी डेन्जोंगपा ऐसी ही एक मिसाल हैं। गंगटोक में 1948 में जन्मे इस कलाकार ने जेब में महज 1500 रुपये डाले गजल गायक बनने का ख्वाब लेकर कदम रखा, मगर बॉलीवुड ने उन्हें खतरनाक खलनायक के रूप में स्थापित किया।
संगीतप्रिय बचपन बिताने वाले डैनी ने पुणे के एफटीआईआई से कोर्स किया। मुंबई में संघर्ष की घड़ी शुरू हुई। ऑडिशन के चक्कर, डायरेक्टर्स के दहलीज पर सिर झुकाना पड़ा। मोहन कुमार के बंगले पर तो गार्ड बनने का ऑफर तक मिला, जो उनके मन को चुभ गया। उन्होंने ठान लिया सफलता का झंडा गाड़ना है।
‘मेरे अपने’ (1971) से सफर शुरू हुआ सकारात्मक रोल से। ‘धुंध’ (1973) ने नेगेटिव किरदारों का जलवा बिखेरा। कांचा चीना, बख्तावर जैसे पात्रों ने दर्शकों में खौफ पैदा किया। ‘शोले’ में गब्बर का रोल हाथ आया, लेकिन डेट्स की कमी से छोड़ दिया।
क्षेत्रीय सिनेमा से हॉलीवुड तक छाप छोड़ी। ब्रैड पिट वाली ‘सेवन ईयर्स इन तिब्बत’ में तारीफें बटोरीं। पद्मश्री अवॉर्ड और राजपरिवार से विवाह ने जीवन को पूर्णता दी। डैनी की कहानी प्रेरणा है कि मुश्किलें रुकावट नहीं, सीढ़ी बन सकती हैं।