मधुबाला का नाम हिंदी फिल्म जगत में सौंदर्य और प्रतिभा का प्रतीक है। उनकी हंसती-खेलती छवि के विपरीत वास्तविकता में एक गंभीर हृदय रोग ने उनका पीछा किया, जो उनके जीवन को छोटा कर गया।
दिल्ली में वैलेंटाइन डे के दिन 1933 में पैदा हुईं मधुबाला बचपन से ही हृदय की जन्मजात खामी ‘वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट’ से पीड़ित रहीं। स्वतंत्रता पूर्व भारत में इसका इलाज नामुमकिन था। वैद्यों ने मेहनत से परहेज की सलाह दी, अभिनय को घातक करार दिया। आर्थिक संकट और कला प्रेम ने उन्हें आगे बढ़ाया। उन्होंने दर्द को दबाकर सितारा बनी रहने का संकल्प लिया।
शुरुआती फिल्मों में स्वास्थ्य साथ दिया, लेकिन लोकप्रियता के साथ चुनौतियां बढ़ीं। अत्यधिक शूटिंग, वजनी वेशभूषा और दौरे उनके हृदय को कमजोर करते चले गए। सेट पर सांस लेने की कसरत, बेहोशी या रक्त की उल्टी जैसी विपत्तियां झेलीं, लेकिन पेशेवरता कभी नहीं डिगी।
करियर की सबसे बड़ी फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ ने उनकी कुर्बानी की मिसाल कायम की। शीश महल का ऐतिहासिक सीन फिल्माने को ठंड में खड़ी रहीं, चिकित्सकीय चेतावनीयों को ठेंगा दिखाया। प्रत्येक सत्र के बाद स्वास्थ्य ढह जाता, चिकित्सा सहायता जरूरी पड़ती।
उपचार हेतु लंदन पहुंचीं तो विशेषज्ञों ने बचे समय की गिनती सुना दी। शोहरत की बुलंदियों पर शादी-बच्चों से वर्जित रहीं। दिलीप कुमार से ब्याह कर खुशियां चुनीं।
शादी के बाद वे घर-मुक्त हो गईं। सांस की मशीनें, देखभाल करने वाले उनकी दुनिया बन गए। नई फिल्में ललचाती रहीं, किंतु अस्वीकार करनी पड़ी। उद्योग का प्रेम फीका पड़ गया, तन्हाई ने साथ दिया।
36 साल की युवावस्था में 23 फरवरी 1969 को अलविदा कह गईं। उनकी जीवनी प्रेरणा देती है—प्रतिभा और दर्द का अनोखा संगम।