राष्ट्रीय महिला दिवस पर सरोजिनी नायडू को याद करते हुए हम उन फिल्मों की बात करते हैं जो हिंदी साहित्य की नायिकाओं को पर्दे पर उतारती हैं। ये रचनाएं प्रेम, बलिदान और स्वतंत्रता की थीम पर बुनी गई हैं, समाज की बेड़ियों को तोड़ती हुईं।
शरतचंद्र की परिणीता (2005) में विद्या बालन ललिता बनकर ऊंच-नीच और दहेज के जाल से लड़ती हैं, भावुक प्रेम की मिसाल पेश करती हैं।
विभाजन की विभीषिका दिखाती पिंजर (2003) अमृता प्रीतम के उपन्यास से ली गई। उर्मिला मातोंडकर का पुरो सामाजिक बहिष्कार झेलते हुए मानवता की मिसाल बनता है।
तसलीमा नसरीन से प्रभावित लज्जा (2001) नारी शोषण की कथा कहती है, जिसमें कई महिलाओं के दर्द एक सूत्र में बंधे हैं।
उसकी रोटी (1969) मोहन राकेश की कहानी पर बनी, जो एक स्त्री के चुपचाप सहे कष्टों को न्यूनतम शैली में प्रस्तुत करती है।
मीना कुमारी की चित्रलेखा (1964) भगवती चरण वर्मा के उपन्यास से पाप-पुण्य की बहस छेड़ती है, स्त्री स्वतंत्रता पर जोर देती है।
बिमल मित्र के साहब बीबी और गुलाम (1962) में छोटी बहू समय के साथ बदलते समाज में अपनी जगह तलाशती है।
इन फिल्मों ने साहित्य की झलक सिनेमा में उतारी, नारी की ताकत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।