13 फरवरी को उस्ताद अमीर खां की स्मृति में संगीत प्रेमी नतमस्तक हैं। एक समय ऐसा आया जब मंच पर 15 मिनट गाकर ही उन्हें नीचे उतार दिया गया, किंतु इस अपमान ने उनके संकल्प को और पुष्ट किया। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की पहचान बन चुके इस उस्ताद ने अपनी अनूठी शैली से इतिहास रचा।
मध्य प्रदेश के इंदौर में 15 अगस्त 1912 को जन्म। पिता शाहमीर खां की सारंगी होलकर दरबार की शान थी, दादा चंगे खां मुगल सम्राट के दरबारी गायक। मां के जल्दी निधन ने बचपन को संवेदनशीलता से भर दिया।
सारंगी से प्रारंभ कर गायन और तबला में निपुणता हासिल की। पारिवारिक सभाओं ने उनकी प्रतिभा को निखारा। 1934 में बॉम्बे पहुंचे, जहां शुरुआती अस्वीकृति मिली। धीमी, गंभीर अंदाज से श्रोता असंतुष्ट। एक कार्यक्रम में मात्र 15 मिनट बाद विराम, ठुमरी सुझाव अस्वीकार।
ध्रुपद-ख्याल का अनूठा मिश्रण इंदौर घराने का आधार बना। फिल्मी गीतों—झनक झनक पायल बाजे, गूंज उठी शहनाई—ने लोकप्रियता बटोरी। संगीत नाटक अकादमी, पद्म भूषण जैसे पुरस्कार। कोलकाता सड़क हादसे में 1974 में अलविदा। उनकी गायकी आज भी जीवंत है।