सुप्रीम कोर्ट ने ‘घूसखोर पंडत’ फिल्म के विवाद पर भारी पड़ते हुए निर्माताओं को फटकार लगाई। 12 फरवरी की सुनवाई में अदालत ने अभिव्यक्ति की आजादी को किसी वर्ग के अपमान का बहाना न ठहराने की हिदायत दी। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने केंद्र, सीबीएफसी और नीरज पांडे को नोटिस थमाए, जवाब 19 फरवरी तक मांगे।
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि विविधतापूर्ण भारत में धर्म-जाति संतुलन संवैधानिक कर्तव्य है। ऐसे नाम अशांति फैला सकते हैं। ‘देश की दरारों के बीच हम निष्क्रिय कैसे रहें?’ बेंच ने तल्खी से पूछा। याचिका में शीर्षक को पंडितों के खिलाफ नकारात्मक चित्रण बताया गया, जो सामाजिक सौहार्द बिगाड़ सकता है।
निर्माताओं ने ट्रेलर हटाने और नाम परिवर्तन की जानकारी दी, लेकिन अदालत ने लिखित हलफनामा मांगा। नया टाइटल और आपत्तिजनक कंटेंट न होने का प्रमाण देना होगा।
यह मामला साबित करता है कि सिनेमा की कलात्मकता समाज को बांटने का हथियार नहीं बन सकती। संविधान की भावना के अनुरूप एकता बनाए रखने में फिल्म जगत की भूमिका अहम है। अगली कार्रवाई से साफ होगा कि रचनाकार कितने संवेदनशील हैं।