कमाल अमरोही की फिल्में कम थीं, लेकिन प्रभाव गहरा। अमरोहा के जमींदार परिवार में 1918 जन्मे इस शायर निर्देशक ने सिनेमा को नई ऊंचाइयां दीं। मुंबई में मोदी के साथ काम शुरू किया, सहगल ने पहचाना। ‘पुकार’, ‘शाहजहां’ जैसी फिल्मों के संवाद उनके थे।
‘महल’ (1949) से धमाल मचा। भूतिया प्रेम कहानी, लता का सुपरहिट गीत।
मीना कुमारी से 1952 शादी, ‘दायरा’ (1953) बनी। ‘पाकीजा’ पर 1958 से 1972 तक संघर्ष। झगड़े, स्वास्थ्य समस्याएं रुकीं नहीं। अमरोही की बहुमुखी प्रतिभा चमकी—सब कुछ खुद किया। मीना साहिबजान बनीं, अंतिम उत्कृष्ट भूमिका। गीत ‘इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा’ आज भी गूंजते हैं।
हेमा की ‘रजिया सुल्तान’ (1983) भव्य रही, सफलता कम। बाकी प्रोजेक्ट अधूरे।
जीवन फिल्म सरीखा: तीन विवाह, मीना संग प्रेम से अलगाव। उनकी 1972 मृत्यु के 21 साल बाद अमरोही 1993 में चल बसे, पास दफन।
स्टूडियो बनाए, शाही स्टाइल अपनाया। भावुकता, गहराई वाली फिल्में इतिहास रच गईं। कमाल अमरोही की यादें ‘पाकीजा’ में बसी हैं।