मुंबई की चकाचौंध वाली दुनिया में 1950 के आखिर आगरा का लड़का पहुंचा। डॉक्टर बनने का सपना, लेकिन पीएमटी फेलियर ने रास्ता मोड़ दिया। सिनेमा में उतरकर रवि टंडन कहानीकारों के हृदय की धड़कन पढ़ने लगे। सिनेमा के इस कुशल शल्य चिकित्सक की गाथा दिलचस्प है।
आगरा में 17 फरवरी 1935 को प्रतिष्ठित पंजाबी परिवार में जन्म। मुंबई में छोटे रोल से शुरुआत—100 रुपये पर पुलिस व लुटेरे बने। ‘लव इन शिमला’ (1960) ने निर्देशन का भेद खोला।
आरके नय्यर के साथ काम कर सीखा, मनोज कुमार ने ‘बलिदान’ (1971) सौंपा। मारधाड़ के दौर में टंडन ने साइकोलॉजिकल मिस्ट्री व म्यूजिकल थ्रिलर गढ़े।
‘अनहोनी’ (1973) संजीव कुमार के साथ आज भी रोमांचित करती। ‘मजबूर’ (1974) में अमिताभ का किरदार अनोखा, अंतिम ट्विस्ट शानदार।
‘खेल खेल में’ (1975) ने कॉलेज रोमांस, पंचम संगीत व कत्ल का पेचीदा जाल बुना, ऋषि कपूर-नीतू सिंह सितारे बने।
परिवारवाद न करने की मिसाल—रवीना को प्रोत्साहन दिया, न लॉन्च। ‘पत्थर के फूल’ से उड़ान, ‘शूल’, ‘दमन’ में बहुमुखी। नाम पिता-माता से।
फिल्में चुस्त, संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल व आरडी से हिट: ‘खुल्लम खुल्ला प्यार…’, ‘आई लव यू’।
11 फरवरी 2022 को अलविदा। जुहू का ‘रवि टंडन चौक’, ब्रज रत्न 2020 सम्मान। सिनेमा में योगदान अमिट।