शोभा गुर्टू, जिन्हें ठुमरी की रानी कहा जाता है, भारतीय संगीत की एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने लुप्तप्राय शैली को पुनर्जीवित किया। 1925 में बेलगांव जन्मीं शोभा ने अपनी मां मेनकाबाई से संगीत की बुनियाद रखी और उस्तादों से उच्च कोटि की ट्रेनिंग ली।
ठुमरी को छोटी महफिलों से निकालकर उन्होंने इसे बड़े मंचों पर पहुंचाया। कार्नेगी हॉल जैसे स्थानों पर उनके प्रदर्शन ने दुनिया को ठुमरी का लोभ भरा। दादरा, कजरी, होरी का मिश्रण उनकी विशेषता था, जिसमें चेहरे के भाव गीतों को और गहरा बनाते थे।
बिरजू महाराज के साथ सहयोग ने उनके कला को नया आयाम दिया। बॉलीवुड में ‘पाकीजा’ का भोपाली, ‘फागुन’ और ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ के गीतों ने उन्हें घर-घर मशहूर किया।
पद्मभूषण, संगीत नाटक अकादमी जैसे पुरस्कार उनके योगदान के प्रमाण हैं। 2004 में अलविदा कह गईं, मगर उनकी ठुमरियां आज भी गूंज रही हैं, नई पीढ़ी को प्रोत्साहित करती हुईं।