एक ऐसी आवाज जो गुलामी की जंजीरें तोड़ती थी और आजादी के जश्न में रंग भरती थी। कवि प्रदीप की जयंती पर याद आते हैं उनके वे शब्द जो लता मंगेशकर को रुला गए और पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को गर्व से नम कर दिया। 1915 में जन्मे इस कवि ने ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ से अमरता पाई।
लखनऊ से पढ़ाई कर मुंबई आए प्रदीप ने ‘कवि प्रदीप’ नाम से पहचान बनाई। 1939 का कवि सम्मेलन उनके भाग्य का द्वार खोला। 71 फिल्मों, 1700 गीतों की रचना की, हर शब्द में जोश भरा।
ब्रिटिश काल में खतरा बने। ‘चल चल रे नौजवान’ पर बैन, ‘किस्मत’ के गीतों से गुमनामी। 1962 युद्ध के शहीदों पर लिखा गीत लता को सुनाया तो वे रो पड़ीं। रिहर्सल में प्रदीप को बुलाया, आशा को जोड़ा मगर दिल्ली में अकेले लता ने गाया।
गणतंत्र दिवस 1963, दिल्ली स्टेडियम। नेहरू, राधाकृष्णन सहित 50 हजार श्रोता। गीत की पहली पंक्ति से सन्नाटा। नेहरू भावविभोर: ‘यह न रुलाए तो हिंदुस्तानी नहीं।’
पुरस्कारों की झड़ी लगी, मगर निजी जीवन दर्द भरा। पत्नीवियोग, लकवाग्रस्त, बच्चों का परित्याग। कोलकाता व्यापारी ने संबल दिया। 1998 में देहावसान। स्मृति में डाक टिकट, सम्मान योजना उनकी विरासत को संजोए हुए।