1940 के दशक में जब पुरुष सितारे कमाते थे आसमान छूते वेतन, सुरैया ने उन्हें पीछे छोड़ दिया। रूप-रंग-आवाज का जलवा बिखेरते हुए वे सिनेमा की बादशाह बनीं। पुण्यतिथि पर याद करते हैं वह प्रेम जिसे परिवार ने कुर्बान करवा दिया।
फिल्मी दुनिया में कदम 12 साल की उम्र में पेश मामा एम. जहांर के साथ। ‘ताज महल’ से शुरुआत। नौशाद ने रेडियो पर सुनी आवाज को ‘शарда’ में जगह दी। 300+ गीतों से ‘मलिका-ए-तरन्नुम’ बनीं। हर प्रोड्यूसर की पसंद।
देव आनंद का दिल जीता। ‘विद्या’ से ‘अफसर’ तक सात सुपरहिट। सेट पर प्यार पनपा – नाम पुकार, सीनों में सच्चाई।
परिवार की कट्टरता बाधा बनी। नानी सेट कंट्रोल करतीं। देव की हीरों वाली अंगूठी भी न पसीजी। विरोध सहन न हो सका, रिश्ता समाप्त।
अंतिम भेंट में आंसुओं का सैलाब। अंगूठी का समुद्र में विसर्जन। जीवनांत तक अविवाहित रहीं सुरैया। यह कथा पुरानी परंपराओं का आईना है।