दीपिका पादुकोण द्वारा मां बनने के बाद 8 घंटे शिफ्ट की मांग ने हिंदी सिनेमा में कामकाजी माहौल पर बहस छेड़ दी। इस संदर्भ में दीपक पराशर ने खुलकर इंडस्ट्री की असमानताओं पर बोला। उन्होंने बताया कि सच्ची लड़ाई उन कलाकारों की है जो संघर्ष कर रहे हैं और शीर्ष नेताओं से मदद की अपील की।
बड़े कलाकारों की सुविधाएं छोटे अभिनेताओं के लिए प्रासंगिक नहीं। वे टीआरपी और कमाई के दम पर नियम खुद बनाते हैं। संघर्षरत कलाकार इन बहसों से अछूते रह जाते हैं। उद्योग की धुरी ये ही सितारे हैं।
पराशर ने पूछा कि क्या ये सितारे कभी कमजोर साथियों के हक में बोलेंगे? आराम के आदी लोग आंदोलन से दूर रहते हैं। लेकिन अब बदलाव की लहर है। पूनम ढिल्लों, पद्मिनी कोल्हापुरे, उपासना सिंह जैसे अनुभवी एक मंच पर हैं।
46 साल इंडस्ट्री में बिताने वाले पराशर भविष्य के लिए चिंतित हैं। कोरोना में सितारों की मदद—ऋतिक का राशन, सोनू का सेवा कार्य, सलमान, शाहरुख, अक्षय की सहायता—सराहनीय थी, पर अस्थायी। अब डिजिटल युग में एकजुट एसोसिएशन जरूरी है।
राजनीतिक इच्छाशक्ति ही रास्ता है। पीएम मोदी, अमित शाह, अरुण गोविल से नीतिगत समर्थन की अपेक्षा। इससे उद्योग में समानता आएगी और हर कलाकार सुरक्षित महसूस करेगा।