पराक्रम दिवस पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन की झलक सिनेमा में बार-बार नजर आती है। उनके अदम्य पराक्रम को सम्मानित करने का यह दिन उनकी स्क्रीन उपस्थिति से और प्रखर होता है।
सुभाष चंद्र’ (1966) बंगाली सिनेमा की शुरुआती कोशिश थी। निर्देशक पीयूष बोस और अभिनेता समर कुमार ने उनके प्रारंभिक संघर्ष को सरलता से बुना। शिक्षा से क्रांति तक का सफर मार्मिक है।
श्याम बेनेगल की 2004 फिल्म ने वैश्विक स्तर पर ख्याति पाई। सचिन खेडेकर और दिव्या दत्ता ने 1941 से आजाद हिंद फौज तक की घटनाओं को जीवंत किया। युद्ध, कूटनीति और निजी लड़ाई का चित्रण यादगार है।
‘बोस: डेड/अलाइव’ (2017) ने विमान हादसे की सच्चाई पर बहस छेड़ी। राजकुमार राव की परफॉर्मेंस और अनुज धर की किताब ने इसे रोचक बनाया।
बंगाली ‘नेताजी’ टीवी सीरीज और ‘गुमनामी’ फिल्म ने उनके शुरुआती दिनों व रहस्यों को नया रूप दिया। ये सभी माध्यम नेताजी के ‘तुम मुझे खून दो’ नारे को गूंजाते रहेंगे।