मुंबई के गलियारों से निकली डिंपल कपाड़िया की जिंदगी संघर्षों की किताब है। 12 बरस की उम्र में कुष्ठ रोग ने उन्हें घेर लिया, लेकिन हार न मानते हुए इलाज से वे उबर आईं और ‘बॉबी’ फिल्म से सुपरस्टारडम हासिल किया। आज वे अपनी दास्तान बयान कर लोगों को कुष्ठ के कलंक से आजादी दिलाने का प्रयास कर रही हैं।
यह संक्रामक रोग त्वचा व नसों पर हमला करता है, जिसमें हल्के धब्बे, बाल झड़ना व दर्दहीन घाव लक्षण हैं। नॉर्वे के वैज्ञानिक हैंसेन की खोज के बाद इलाज आसान हो गया है—मुफ्त दवाओं से पूर्ण मुक्ति मिलती है। 23 जनवरी को विश्व कुष्ठ दिवस इसी संदेश को फैलाता है।
डिंपल याद करती हैं, कलाई के निशान पर ताने कसे गए, स्कूल छुड़वाने की धमकी दी गई। शब्दों का मतलब न समझ पाईं, लेकिन राज कपूर ने ‘बॉबी’ देकर जिंदगी बदल दी। अमिताभ बच्चन ने 2018 के वैश्विक अपील में भेदभाव का विरोध किया। आर माधवन लेपरा इंडिया से जुड़कर जागरूकता फैला रहे हैं।
इन हस्तियों का मानना है कि ठीक हो चुके मरीज सामान्य जीवन जी सकते हैं, जरूरत है स्टिग्मा मिटाने की। कुष्ठ अब भयानक नहीं, इलाज सरल है। समझ और सहयोग से हम समाज को मजबूत बना सकते हैं। डिंपल जैसी कहानियां सबको प्रेरित करती हैं।