एआर रहमान के विवादास्पद बयान पर शान ने साथ खड़े होकर कहा कि संगीत में सांप्रदायिक रंग नहीं घुलना चाहिए। रहमान ने कहा था कि ‘संगीत का कोई सांप्रदायिक पक्ष नहीं,’ जिस पर सोशल मीडिया गरमा गया। शान ने वीडियो संदेश जारी कर स्पष्ट किया, ‘संगीत आत्मा की भाषा है, न कि संप्रदाय की।’
यह बयान कला की स्वतंत्रता पर एक मंच से निकला। आलोचकों का कहना है कि यह भारत की सांस्कृतिक विविधता को नजरअंदाज करता है, लेकिन शान ने रहमान के ग्लोबल सफर का हवाला दिया। ‘जय हो’ से ‘कुन फया कुन’ तक, उनके गीत सभी को जोड़ते हैं।
शान ने अपने तीन दशक लंबे सफर का जिक्र किया। ‘तड़ीपार’ से ‘कभी कभी इत्तेफाक से’ तक, मेरे गाने प्रेम और जीवन का उत्सव हैं।’ उन्होंने राजनीति से कला को दूर रखने की अपील की। रहमान की कार्नाटिक-सूफी फ्यूजन को सराहते हुए कहा कि यही संगीत की ताकत है।
विवाद के बीच यह बहस उभर रही है कि क्या कला को सामाजिक सीमाओं में बांधा जाए। शान का समर्थन रहमान के पक्ष को मजबूत कर रहा है, जो संगीत को विभाजन के बजाय एकता का माध्यम बनाए रखने की कोशिश है। आने वाले दिनों में यह चर्चा और गहरा सकती है।