अनुपम खेर ने एक इवेंट में अपनी पीढ़ी के मनोरंजन जगत के बदलावों पर खुलकर बात की। ग्रामोफोन से स्पॉटिफाई और रेडियो से ओटीटी तक का उनका वर्णन बेहद भावुक और प्रेरणादायक रहा। चार दशकों से अधिक के करियर में उन्होंने हर दौर को अपनाया।
शिमला के छोटे से घर में ग्रामोफोन ही उनका पहला संगीत शिक्षक था। फिर रेडियो सेट ने क्रिकेट मैचों और नाटकों से उन्हें अभिनेता बनने की प्रेरणा दी। एनएसडी से निकलकर ‘सारांश’ जैसी फिल्मों ने उन्हें स्थापित किया।
आज स्पॉटिफाई पर क्लिक से गाने सुनने का जमाना है, वैसे ही ओटीटी ने अभिनय के नए द्वार खोले। अनुपम खेर ने कहा, ‘यहां उम्र मायने नहीं रखती, टैलेंट ही राज करता है।’ पाइरेसी और एल्गोरिदम चुनौतियां हैं लेकिन संभावनाएं अनंत।
अंत में उन्होंने कहा कि जड़ों को न भूलें। उनका अनुभव नई पीढ़ी के लिए एक सबक है कि अनुकूलन ही सफलता की कुंजी है।