दिलीप प्रभावलकर की कहानी सिनेमा जगत की अनसुनी दास्तान है। जवानी के दिनों में बुजुर्गों के किरदार निभाकर उन्होंने थिएटर से फिल्मों और अंततः ऑस्कर अवॉर्ड तक का शानदार सफर तय किया।
1970 के दशक में मुंबई के नाट्य मंचों पर प्रभावलकर ने कमाल दिखाया। महज 22 साल की उम्र में वे दादा-दादी के रोल कर रहे थे। विजय तेंडुलकर जैसे निर्देशकों ने उनकी प्रतिभा पहचानी। ‘भुजंग’ और ‘घाशीराम कोतवाल’ जैसे नाटकों ने उन्हें स्टार बना दिया।
मराठी सिनेमा में वे हिट साबित हुए। कॉमेडी से लेकर सीरियस ड्रामा तक, हर жанр में बुजुर्ग किरदारों को नया आयाम दिया। ‘लक्ष्य’ रीमेक में उनकी वयोवृद्ध भूमिका सराही गई। 150 से ज्यादा फिल्मों का फिल्मोग्राफी उनका गौरव है।
अंतरराष्ट्रीय पहचान ‘विलेज रॉकस्टार्स’ से मिली। रीमा दास की इस ऑस्कर विजेता डॉक्यूमेंट्री में नैरेटर की आवाज में उन्होंने ग्रामीण जीवन की सच्चाई उतारी। यह उपलब्धि उनके संघर्ष का फल थी।
अब वे लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं। युवाओं को वे कहते हैं- ‘उम्र कोई बाधा नहीं, अभिनय में आत्मा लगाओ।’ प्रभावलकर का जीवन हर कलाकार के लिए प्रेरक है।