मध्य पूर्व के बढ़ते तनाव के कारण भारतीय रुपया डॉलर के सामने बुधवार को अब तक के सबसे निचले स्तर पर फिसल गया। पहली बार 92.30 तक गिरा यह स्तर कारोबार में 0.8 प्रतिशत की कमजोरी दर्शाता है, जो पहले के 91.875 रिकॉर्ड को पीछे छोड़ गया।
संघर्ष से उत्पन्न महंगाई, व्यापार असंतुलन और उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी निकासी की आशंकाएं रुपये पर भारी पड़ रही हैं।
दूसरी ओर, युद्धग्रस्त क्षेत्र से कच्चे तेल में भारी उछाल आया है। 12-13 प्रतिशत की तेजी से दाम 82 डॉलर बैरल पर पहुंचे—2020 के बाद सबसे अधिक। भारत जैसे आयातक देश के लिए यह मारक है, जहां 80 प्रतिशत तेल विदेश से आता है और प्रति डॉलर बढ़ोतरी से 2 अरब डॉलर का अतिरिक्त खर्च होता है।
सऊदी तेल इकाइयों पर ईरानी जवाबी कार्रवाई और होर्मुज जलडमरूमध्य अवरुद्ध करने की धमकी ने ऊर्जा संकट को गहरा दिया। वैश्विक महंगाई का खतरा मंडरा रहा है।
बाजाज फिनसर्व रिपोर्ट के मुताबिक, स्थिर घरेलू माहौल के बावजूद एफपीआई बिकवाली, अमेरिकी शुल्क और भू-राजनीति ने रुपये को नीचे धकेला। भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता से सेंटीमेंट में सुधार की उम्मीद। आयातक डॉलर न खरीदें, आरबीआई पर नजर रखें।
आगे तेल बाजार और केंद्रीय बैंक की प्रतिक्रिया रुपये की दिशा तय करेगी। लंबे संघर्ष से भारत का चालू खाता दबाव में आ सकता है, जिसके लिए नीतिगत कदम जरूरी होंगे।