बाजार की इस महाविद्यालय में हर निवेशक को इक्विटी और प्रेफरेंस शेयर के बीच की खाई समझनी चाहिए। दोनों कंपनी स्वामित्व देते हैं, लेकिन लाभ वितरण, अधिकार और अनिश्चितता पूरी तरह अलग। सही ज्ञान से ही रणनीतिक निवेश संभव, वरना नुकसान की मार पड़ सकती है।
साधारण इक्विटी शेयर वास्तविक भागीदारी का दरवाजा खोलते हैं। वोटिंग अधिकार से कंपनी के भविष्य पर असर डालें, लाभांश प्रदर्शन पर आधारित। कर्ज व खर्च बाद बंटता मुनाफा ऊंचे अवसर पैदा करता है, मगर बाजार की लहरें जोखिम बढ़ाती हैं। लंबे सफर के लिए आदर्श।
प्रेफरेंस शेयर प्राथमिकता के सिद्धांत पर टिके हैं। निश्चित डिविडेंड पहले, दिवालिया स्थिति में प्राथमिक भुगतान। वोटिंग की कमी के बावजूद आय की निरंतरता। विकास सीमित, लेकिन सुरक्षा उच्च।
चुनाव व्यक्तिगत प्रोफाइल पर निर्भर—जोखिम भूखे इक्विटी अपनाएं, सतर्क प्रेफरेंस। दोनों का संतुलन सर्वोत्तम। बाजार सिखाता है: जानकारी ही सबसे बड़ा संपत्ति।