कुमार मंगलम बिड़ला ने अपने नवीनतम ‘वार्षिक चिंतन’ में भारत को वैश्विक अस्थिरता के दौर में एक चमकता सितारा बताया है। आदित्य बिड़ला ग्रुप के प्रमुख के अनुसार, दुनिया बदली हुई भू-राजनीति के बाजार में फंसी है, जहां साझेदारियां क्षणभंगुर हैं।
राजनीतिक संबंध अब वार्ताओं पर टिके हैं, न कि निश्चित सिद्धांतों पर। इससे देशों और कंपनियों के लिए रणनीतियां बनाना कठिन हो गया है।
फिर भी, भारत की आर्थिक रफ्तार तेज और स्थिर है। बिड़ला ने इसे जनसंख्या के बल, इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार, औपचारिक अर्थव्यवस्था और महत्वाकांक्षी मिजाज से जोड़ा।
भारत का आकर्षण इसकी विशालता और भरोसेमंदी में है, जो सौदेबाजी वाली दुनिया को ठहराव देती है। देश विकास का उपभोक्ता नहीं, साझेदार है।
समूह की कहानी भी यही बयां करती है। राष्ट्र सेवा करते हुए विस्तार इसका मूलमंत्र रहा। एमएसएमई क्षेत्र में पिछले 10 वर्षों में ऋण तीन गुना बढ़े, और समूह की लोन बुक 17 हزار करोड़ से 1.5 लाख करोड़ तक पहुंची।
यह चिंतन नोट बिड़ला का ‘मन का हिसाब-किताब’ है, जो दुनिया, भारत, समूह और दीर्घकालिक सबकों पर रोशनी डालता है। यह भारत की अद्वितीय स्थिति को रेखांकित करता है।