आज 8 मार्च को साहिर लुधियानवी की जयंती पर नजर डालें उनके जीवन पर, जो प्रेरणा का स्रोत है। लुधियाना में 1921 में जन्मे साहिर का परिवार अमीर था लेकिन माता-पिता के तलाक ने सब उजाड़ दिया। मां के साथ उन्होंने कंगाली देखी, नौकरियों की होड़ लगाई।
उम्मीद की किरण बनी रही। ‘तल्खियां’ (1945) ने उन्हें उर्दू के सितारे का दर्जा दिया। मुंबई आगमन 1949 में। फिल्मी दुनिया में छोटे कामों से शुरूआत, फिर ‘नौजवान’ (1951) में पहला मौका। ‘बाजी’, ‘प्यासा’, ‘मुनीमजी’ ने अमर कर दिया।
एसडी बर्मन संग उनकी साझेदारी अविस्मरणीय। गीतों में विद्रोह, प्रेम, समाज का चित्रण अनुपम। ‘धूल का फूल’ का मानवता का पैगाम, ‘साधना’ का स्त्री-विरोध, ‘गुमराह’ का विरह, ‘शगुन’ की प्रकृति-प्रेम, ‘बहू बेगम’ की वफा, ‘चित्रलेखा’ के नैतिक प्रश्न—सब क्लासिक।
साहिर सिर्फ गीतकार नहीं, विचारक थे। उनकी रचनाएं साहित्यिक गरिमा प्रदान करती थीं। आज भी युवा पीढ़ी उनके बोल गुनगुनाती है। संघर्षों से सीख: सपनों पर डटे रहें, सफलता जरूर मिलेगी। साहिर का योगदान सिनेमा को हमेशा याद रहेगा।