मध्य भारत के आदिवासी इलाकों में एक नई क्रांति का सूत्रपात हो चुका है। मंडला जिले के पिछवाड़ी खेतों को एग्रोइकोलॉजिकल होमस्टेड ने बदल दिया है, जिससे महिलाओं की आय और परिवारों का पोषण मजबूत हुआ। सीजीआईएआर मल्टीफंक्शनल लैंडस्केप्स और प्रदान की यह परियोजना भूमि के इष्टतम उपयोग पर जोर देती है।
आईडब्ल्यूएमआई के आंकड़े बताते हैं—उत्पाद विविधता में 350 प्रतिशत वृद्धि, भोजन विविधता दोगुनी, पौष्टिक हरी सब्जियों का उपभोग 70 प्रतिशत ज्यादा। मुर्गी पालन से प्रोटीन, बचत बढ़ी और बाहरी संसाधनों की जरूरत कम हुई।
तकनीक में विविध सब्जियां, फसल चक्र, जैविक खाद, जल संरक्षण और पशु एकीकरण शामिल। महिलाओं ने पारंपरिक खेती को पीछे छोड़ नेतृत्व संभाला।
पहले ढलानों पर मक्का, नदियों किनारे धान—बैकयार्ड खाली। बारिश की अनिश्चितता, मिट्टी क्षरण और मूल्य उतार-चढ़ाव ने तबाही मचाई। सौरव कुमार के मुताबिक, अब 400-500 वर्ग मीटर प्लॉट जीवामृत-पंचगव्य से हरे-भरे हैं।
कुसुम बोलीं, ‘बाजार की बजाय घर की उपज अब जीवनरेखा।’ यह मॉडल ग्रामीण सशक्तिकरण का नया अध्याय लिख रहा है, जो पूरे देश के लिए प्रेरणा स्रोत बनेगा।