फणीश्वरनाथ रेणु हिंदी कहानीकारों में अनूठे हैं, जिन्होंने गांव की गोठियां और खलिहानों को साहित्य का आधार बनाया। ‘मारे गए गुलफाम’ उनकी ऐसी ही कृति है, जो राज कपूर अभिनीत फिल्म ‘तीसरी कसम’ के रूप में सिनेमाई इतिहास रच चुकी है।
फिल्म में बैलगाड़ी चालक हीरामन का किरदार ग्रामीण मासूमियत का प्रतीक है। नौटंकी वाली हीराबाई से उसकी निकटता सामाजिक रूढ़ियों पर करारा प्रहार करती है। प्रेम के साथ-साथ यह ग्रामीण जीवन की चुनौतियां, छोटी-छोटी खुशियां और मानवीय संवेदनाओं का चित्रण है। शीर्षक ‘तीसरी कसम’ हीरामन के अटल निश्चय को दर्शाता है।
रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के एक छोटे से गांव में हुआ। वहां की जिंदगी—बच्चों की किलकारियां, बुजुर्गों की लोककथाएं, औरतों का संघर्ष—उनकी कलम से उतर आई। भाषा सरल, स्वाभाविक, जैसे गांव की चौपाल पर सुनाई जाए।
आजादी की लड़ाई, कारावास, नेपाल की क्रांति जैसे प्रसंगों ने उनके स्वर को और मुखर किया। भारत सरकार ने पद्मश्री देकर उनका सम्मान किया। रेणु की यह कहानी साहित्य और सिनेमा के संगम का अनमोल उदाहरण है, जो आम आदमी की गरिमा को अमर बनाती है।