मुंहजोर मिजाज के उर्दू शहजादे फिराक गोरखपुरी यानी रघुपति सहाय ने शायरी को नया आयाम दिया। दर्द-ए-इश्क, वतन की आस और गीता के दर्शन उनकी गजलों-नज्मों में सांस लेते हैं। गोरखपुर में 28 अगस्त 1896 को जन्मे इस शायर का दिल्ली में 3 मार्च 1982 को देहांत हुआ, पर उनकी रचनाएं अमर हैं।
1918 से 1930 तक का दौर उनकी रचनात्मक उड़ान का स्वर्णिम काल। 100 से अधिक गजलें, दर्जनों रुबाइयां, नज्में लिखीं। उर्दू शायरी में सत्य, भावुकता, नैतिकता का नया दौर आया, जिसमें फिराक का दर्दभरा अंदाज मील का पत्थर साबित हुआ।
स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय। ब्रिटिश सिविल सेवा त्यागकर गांधीजी के आंदोलनों में शामिल। आगरा जेल में 15 माह सियासी कैदी। मुशायरे में शेर पढ़ा—’बिखर कर भी ये राजा परेशान न हुआ।’ नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस कमेटी में सेवा की।
जिंदगी भर की मोहब्बत ने शायरी को गहराई दी। 1918 का इश्क 12 साल चला। शारीरिक आकर्षण को आंतरिक जज्बे से पुख्ता किया। पिता और भाइयों के दुख नज्मों में उतरे—सुबह की रौनक में दर्द का एहसास।
भगवद्गीता से लबरेज ‘नगम-ए-हकीकत’ में कृष्ण के संदेश को उर्दू सुंदरता से बयान किया—सब कुछ उनके नूर से, जंग-ए-बदर से करबला तक। 1924 की देशभक्ति गजल अंग्रेजी राज के खिलाफ जज्बा जगाती।
साहित्य अकादमी (1960), पद्म भूषण, ‘गुल-ए-नगमा’ पर ज्ञानपीठ जैसे पुरस्कार। फिराक बहुआयामी प्रतिभा के प्रतीक हैं—शायरी का जादू, आजादी का जुनून और दर्शन की गहराई आज भी मार्गदर्शक।