गुलमर्ग की बर्फीली ढलानों पर छठे खेलो इंडिया विंटर खेलों का सफल आयोजन हुआ। खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन देखने लायक था, मगर पोडियम पर चमकते पदकों के पीछे हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल (एचएडब्ल्यूएस) की महत्वपूर्ण भूमिका साफ झलकती है।
विभिन्न राज्यों, सेना, सीआरपीएफ व आईटीबीपी के सैकड़ों एथलीट एचएडब्ल्यूएस को अपनी सफलता का आधार मानते हैं। 1948 में ब्रिगेडियर के.एस. थिमैया द्वारा प्रारंभ यह स्कूल पहले स्कीइंग केंद्र था, जो विंटर वारफेयर स्कूल बना और 1962 में उच्च दर्जा पाया।
उच्च ऊंचाई युद्ध व हिम सर्वाइवल ट्रेनिंग का गढ़ एचएडब्ल्यूएस अब सिविलियन खिलाड़ियों को भी तैयार कर रहा है। शिलांग निवासी 25 वर्षीय काजल कुमारी ने कभी बर्फ न देखी हो, फिर भी 15 दिवसीय कोर्स से नॉर्डिक स्प्रिंट की बादशाह बनीं। ‘सीआरपीएफ ने रास्ता दिखाया, एचएडब्ल्यूएस ने ताकत दी,’ उनका कहना है।
इसी तरह कर्नाटक की भवानी टी.एन. ने बर्फ से अपरिचित होते हुए 1.5 किमी स्वर्ण व लंबी दूरी पर कांस्य जीते। एचएडब्ल्यूएस व आईआईएसएम का योगदान सराहनीय।
सेना ने पुरुष 10 किमी नॉर्डिक में पद्मा नमगेल (स्वर्ण), अमन (रजत), मंजीत (कांस्य) से क्लीन स्वीप किया। 1.5 किमी में सनी सिंह, शुभम व मंजीत ने दबदबा बनाया। नमगेल ने कहा, ‘एचएडब्ल्यूएस हर स्तर पर मदद करता है—धन, कोचिंग, विदेश यात्रा सब उपलब्ध। कठिन ट्रैक पर भी हम फिट रहते हैं।’
यहां सालाना सैकड़ों सैनिक व कुछ नागरिक ट्रेनिंग पाते हैं। आधुनिक सिमुलेटर, जिम व उपकरण अंतरराष्ट्रीय हैं। सीआरपीएफ के प्रदर्शन में भी उछाल आया। गुलमर्ग की सफलता एचएडब्ल्यूएस की देन है, जो चैंपियन गढ़ता है।