काशी के बाद उज्जैन ही वह तीर्थ है जहां शिव, मां और शनि की त्रयी कृपा एक साथ प्राप्त होती है। त्रिवेणी घाट पर नवग्रह शनि मंदिर की बात ही अलग है- यहां शनि देव पिंडी स्वरूप में भगवा वर्ण धारण किए हैं, जो दुनिया में अनुपम है। 2000 साल पुरानी यह परंपरा भक्तों को हर दुख से मुक्त करती है।
नवग्रह दोष दूर करने के लिए अनुष्ठान यहां चमत्कारी साबित होते हैं। शनि अमावस्या पर भारी भीड़ उमड़ती है, लोग वस्त्र-चप्पल त्यागकर शांति पाते हैं। मंदिर की भगवा मूर्ति हनुमान जी सी लगती है, पिंडी पर तेल की धारा शिव रूप का बोध कराती है।
विक्रमादित्य कालीन निर्माण, प्रांगण का पीपल वृक्ष जहां धागे की मनौती सफल होती है। दशा पूजन से शनि की क्रूर दृष्टि शांत होती है। छोटे आकार का मंदिर अब ढकी छत से सुसज्जित है।
यह स्थल आधुनिक जीवन की भागदौड़ में शांति का आधार है, जहां आस्था से असंभव संभव हो जाता है। भक्त दूर-दूर से आते हैं, सिद्धि पाते हैं।