बच्चों का दो-तीन साल का समय अभिभावकों के लिए सबसे कठिन होता है। स्वतंत्रता की चाहत में वे हर काम खुद करने को आतुर रहते हैं, लेकिन नाकामी पर गुस्से का विस्फोट हो जाता है। अभिनेत्री इशिता दत्ता अपने ढाई साल के बेटे वायु के अनुभव से साबित करती हैं कि शांति और चतुराई से ये चुनौतियां हल हो सकती हैं।
वायु अब खुद खाना चाहता है, ड्रेसिंग में जुटा रहता है। इशिता बताती हैं, ‘ये स्वाभाविक है, लेकिन जब बच्चा असमर्थ होता है, तो चिढ़ गुस्से में बदल जाती है। इसे टॉडलर मेल्टडाउन कहते हैं।’
उन्होंने प्रयोग किए—कभी कड़ी बात, कभी नरमी। लेकिन दौरा चल रहा हो तो कोई उपाय तत्काल फायदेमंद नहीं। ‘मैं बस पास बैठ जाती हूं, कहती हूं सब सही है, मां साथ है। बच्चे को भावनात्मक सहारा चाहिए, न कि तुरंत हल।’
पैरेंटिंग का फंडा बदलें: आदेश की जगह चॉइस दें। खाने के समय, ‘मैं खिला दूं या खुद ट्राई करो?’ अलमारी से दो जोड़े चुनवाएं। ‘बच्चे को लगता है उसकी सुन ली गई, स्वतंत्रता मिली, मगर असल में मार्गदर्शन आपके हाथ में है।’
वायु अब बेहतर संभल रहा है। इशिता की ये टिप्स हर माता-पिता के लिए उपयोगी हैं—परफेक्शन छोड़ें, विकल्प अपनाएं, शांत रहें। परिवार में सुकून लौटेगा।