देश के महान फुटबॉलर जरनैल सिंह ढिल्लों की गाथा संघर्ष और सफलता की मिसाल है। पाकिस्तान के फैसलाबाद में 1936 में पैदा हुए जरनैल ने 1948 के दंगों में जान गंवाने वाले परिजनों के बाद ट्रक से अमृतसर का रुख किया। भारत में फुटबॉल उनके जीवन का आधार बनी।
महिलपुर खालसा कॉलेज से करियर की नींव, फिर होशियारपुर क्लब और मोहन बागान (1959-68) जहां अफ्रीकी देशों में दमखम दिखाया। उत्कृष्ट सेंटर-बैक, 1960 के दशक में एशिया के सर्वोच्च। कप्तानी 1965-67, ओलंपिक 1960, एशियाई खेल स्वर्ण 1962, मर्डेका सिल्वर 1964।
संतोष ट्रॉफी में बंगाल और पंजाब से कई खिताब। कोच के रूप में पंजाब को 1974-75 में जीत दिलाई। अर्जुन अवॉर्ड 1964। खेल प्रशासन में पंजाब में डायरेक्टर रहे।
पुत्र जगमोहन ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। कनाडा में बसने के बाद 2000 में निधन।
विभाजन पीड़ित से राष्ट्रीय नायक बनने वाली यह कहानी युवाओं को प्रोत्साहित करती है।