1910 की क्रिसमस पर बंबई के सिनेमा हॉल में ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ ने धुंडीराज फाल्के को प्रेरित किया। उन्होंने सोचा, भारतीय देवताओं को भी फिल्मों में उतारेंगे। 1870 में नासिक जन्मे फाल्के को सिनेमा बनाने की धुन चढ़ गई। परिवार ने हंसी उड़ाई, लेकिन मटर पौधे का प्रयोग सबको चकित कर गया।
पत्नी सरस्वतीबाई ने आभूषण बेचे, फाल्के लंदन से कैमरा लाए। ‘राजा हरिश्चंद्र’ में पुरुष अन्ना सालुंके हीरोइन बने। दादर का आशियाना फिल्म फैक्टरी बना। सरस्वतीबाई खाना बनातीं, रील डेवलप करतीं।
1913 में फिल्म रिलीज हुई, दर्शक प्रणाम करने लगे। बाद की फिल्में सुपरहिट रहीं। टॉकीज के जमाने में फाल्के पिछड़ गए। अंतिम दिनों में नासिक में गुमनामी से जूझे। 1944 में उनका देहांत। सिनेमा को नया जीवन देने वाले को 1969 में पुरस्कार से सम्मानित किया गया।