केंद्र के वंदे मातरम को अनिवार्य करने के निर्देश से सियासत गर्मा गई है। भाजपा नेता तरुण चुघ ने इसे ऐतिहासिक कदम बताते हुए जमीयत उलेमा-ए-हिंद के विरोध को खारिज कर दिया।
चुघ ने कहा, वंदे मातरम का स्वर्णिम इतिहास है। यह स्वाधीनता की लड़ाई में क्रांतिकारियों का नारा था, जिन्होंने मां भारती के लिए बलिदान दिया। सरकार का फैसला laudable है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि गीत समस्त भारतीयों को एकजुट करता है, किसी धर्म तक सीमित नहीं। इसे राष्ट्र प्रेम का प्रतीक मानकर अपनाना चाहिए।
शिवसेना के कृष्णा हेगड़े ने समर्थन देते हुए कहा, यह भारत माता को वंदन है। यहां रहने वाले हर संगठन को इसे गले लगाना चाहिए, धार्मिक पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर।
जमीयत के मौलाना हकीमुद्दीन कासमी ने असहमति जताई। उनका कहना है कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। किसी को अपनी आस्था के विरुद्ध कुछ करने को मजबूर नहीं किया जा सकता।
यह मुद्दा देश की एकता-अखंडता पर बहस को नई दिशा दे रहा है। राजनीतिक दलों के बयानबाजी से माहौल तनावपूर्ण हो गया है।