उत्तर प्रदेश में विधानसभा का बजट सत्र सोमवार को राज्यपाल के संयुक्त सत्र संबोधन से प्रारंभ हुआ। किंतु विपक्षी दलों—बसपा, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस—ने इसे जमीन से जुड़े मुद्दों की अनदेखी वाला दस्तावेज करार दे दिया।
बसपा सुप्रीमो मायावती ने सोशल मीडिया एक्स पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि परंपरागत अभिभाषण में विकास, सर्वसमाज उत्थान और जनहित पर जोशपूर्ण प्रतिबद्धता होनी चाहिए थी। वास्तव में, गलत सरकारी फैसलों से प्रदेशवासी गरीबी-बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं, साथ ही अपनी सुरक्षा और आस्था पर संकट सताए हुए हैं। राज्यपाल को इन्हें उजागर कर सरकार को चेताना चाहिए था, जिसके अभाव में सदन में नारेबाजी और हंगामा हुआ।
जनकल्याण वादों के पूर्ति पर विवरण न होने से चिंता बढ़ी, जिसे बजट में सुधारना होगा।
सपा नेता शिवपाल सिंह यादव ने अभिभाषण को भ्रष्टाचार वाली सरकार की चापलूसी बताया। कांग्रेस की आराधना मिश्रा ‘मोना’ ने इसे हवाई घोषणाओं का समूह कहा। 55 पन्नों का दस्तावेज आधा पढ़ा जाना उपलब्धियों की खोखली हकीकत बयान करता है।
उन्होंने कानून व्यवस्था के झूठे दावों पर सवाल उठाए—अपराध चरम पर, भ्रष्टाचार बेलगाम, पुलिस भर्ती ठप। स्वास्थ्य के नाम पर मेडिकल कॉलेज बने नहीं, न ही चिकित्सक-कर्मचारी-दवाएं। कृषि में खाद-बीज की किल्लत और नीतियां किसानों के खिलाफ।
विधानसभा परिसर में कांग्रेस समेत इंडिया मोर्चे ने चौधरी चरण सिंह की मूर्ति 앞 बेरोजगारी, महंगाई, कृषक पीड़ा, खस्ता स्वास्थ्य सेवा व एसआईआर मुद्दों पर धरना दिया।
विपक्ष का यह आक्रोश सत्र को उत्तेजक बनाने का पूर्वानुमान है, जहां वास्तविक समाधान की मांग तेज होगी।