आयुष मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय मिर्गी दिवस पर मिर्गी को न्यूरोलॉजिकल समस्या के रूप में पहचान दिलाने का अभियान चलाया। समाज को कलंक हटाने और सहानुभूति बढ़ाने का संदेश दिया गया।
दौरे के रूप में प्रकट होने वाली यह बीमारी हाथ-पैर के झटकों, झाग और आंखों के ऊपर चढ़ने के लक्षण दिखाती है। दवाइयों से नियंत्रण संभव है, किंतु सांस्कृतिक कारणों से इसे बुरी आत्मा का असर माना जाता है। नतीजा: हानिकारक उपाय और अलगाव।
रोजगार पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ता है। केरल सर्वे के अनुसार, मिर्गी वाले 58% बेरोजगार हैं, सामान्य लोगों से चार गुना अधिक। दौरा, दवा प्रभाव और पूर्वाग्रह जिम्मेदार। नौकरी मिलना मुश्किल, टिकना और भी कठिन।
शिक्षा वृद्धि के बावजूद धारणाएं पुरानी हैं, जो अन्य बीमारियां जन्म देती हैं। एसोसिएशन के दम पर न्यायपालिका ने मिर्गी को गैर-मानसिक घोषित किया। रोकथाम, जागृति और देखभाल पर जोर।
मिर्गी दिवस हमें सिखाता है कि जानकारी से भय मिटेगा। भारत को अब मरीजों को मुख्यधारा में लाना होगा।