बॉलीवुड के पर्दे पर पुलिस इंस्पेक्टर का चेहरा याद आते ही सुजीत कुमार नजर आते हैं। ईमानदार अफसरों के किरदारों ने उन्हें अमर बना दिया। वकील बनने की राह पर थे, लेकिन फिल्मी दुनिया ने उन्हें ऐसा मुकाम दिया जो सदियों तक याद रहेगा।
वाराणसी के चकिया में 1934 में किसान पिता की संतान के रूप में जन्मे शमशेर बहादुर सिंह पढ़ाई में अव्वल थे। लॉ की पढ़ाई के दौरान नाटक में फणी मजूमदार की नजर पड़ी। उनकी आवाज और अंदाज ने निर्देशक को लुभाया, मुंबई का सफर शुरू हुआ।
‘टैक्सी ड्राइवर’ से 1954 में प्रवेश। सहायक भूमिकाओं से संघर्ष, फिर थ्रिलर में उभरना। पुलिस रोल्स ने स्टार बना दिया—गंभीर मुद्रा और जोरदार डायलॉग्स कमाल।
‘इत्तेफाक’ से शुरूआत, फिर ‘अमीरी गरीबी’, ‘द बर्निंग ट्रेन’, ‘टक्कर’, ‘बॉक्सर’, ‘कैदी’, ‘हकीकत’, ‘काला धंधा गोरे लोग’, ‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’ तक खाकी में धाक। सबसे ज्यादा पुलिस किरदार निभाने का रिकॉर्ड उनका।
भोजपुरी में क्रांति लाए—’गंगा मइया तोहे पियरी’, ‘बिदेसिया’, ‘दंगल’, ‘पान खाए सइंया हमार’ सुपरहिट। पत्नी के साथ प्रोडक्शन में ‘खेल’, ‘दरार’, ‘चैंपियन’। सम्मान मिला भोजपुरी से।
अंतिम दिनों में कैंसर ने घेरा, 5 फरवरी 2010 को निधन। सुजीत का सफर प्रेरणादायक है।