नवमां बनने के बाद का समय चुनौतियों भरा होता है, जहां मां और शिशु की सेहत पर नजर रखना बेहद जरूरी है। बच्चे के आगमन की खुशी में मां की जरूरतों को भूलना आम गलती है, जो दोनों के लिए नुकसानदेह सिद्ध हो सकती है। सतर्कता से यह अवसर सुखमय बनाया जा सकता है।
शरीर प्रसव से थक चुका होता है—रक्त की कमी, थकान, पोषण ह्रास। आरामदायक वातावरण, परिवारिक मदद और तनावमुक्त जीवनशैली रिकवरी तेज करती है। कामकाज का बोझ, अनिद्रा या मानसिक दबाव हानिकारक। आयुर्वेदिक दृष्टि से शांति दूध प्रवाह बढ़ाती है।
पौष्टिक आहार चुनें: सब्जियां, प्रोटीनयुक्त दालें, डेयरी उत्पाद, थोड़ा घी, सुपाच्य अनाज। लाभकारी जड़ी-bootियां जैसे मेथीदाना, जीरा, सौंफ, अदरकभुने और शतावरी कमजोरी मिटातीं हैं, दूधवृद्धि करती हैं। मसालेदार-भारी भोजन त्यागें।
मालिश, उष्ण स्नान, हल्के आसन पेटदर्द दूर कर मांसधानी मजबूत बनाते हैं। धैर्य रखें, भारी मेहनत न करें।
मानसिक स्वास्थ्य महत्वपूर्ण—हार्मोन असंतुलन से थकान या निराशा हो सकती है। अपनों का सहयोग मनोबल बढ़ाए।
शिशु के लिए कोलोस्ट्रम अमृत तुल्य। प्रारंभिक छह महीनों में एकाधिकार मातृदुग्ध से प्रतिरक्षा प्रबल होती है। स्वच्छता, ऊष्णता, समयबद्ध आहार सुनिश्चित करें।