बिहार चुनाव नतीजों को चुनौती देने वाली जन सुराज पार्टी को सुप्रीम कोर्ट ने करारा झटका दिया है। अदालत ने याचिका सुनने से साफ इनकार कर दिया और पार्टी से तल्खी से पूछा कि आपकी पार्टी को कितने वोट मिले थे? लोग आपको नामंजूर कर चुके हैं, फिर अदालत को प्रचार का माध्यम क्यों बना रहे हैं?
याचिका में दावा किया गया था कि चुनाव प्रक्रिया में व्यापक अनियमितताएं हुईं। बूथ स्तर पर कब्जा, वोटरों को डराना-धमकाना, ईवीएम में गड़बड़ी और पुलिस का दुरुपयोग जैसे आरोप लगाए गए। जन सुराज ने मांगा था कि पूरे बिहार में फिर से चुनाव कराए जाएं ताकि सच्चा जनादेश सामने आए।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे महज प्रचार स्टंट करार दिया। बेंच ने जोर देकर कहा कि चुनावी परिणामों को उलटने के लिए मजबूत प्रमाण चाहिए, न कि खोखली दलीलें। जन सुराज का वोट प्रतिशत बेहद कम रहा, जो इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि जनता ने इसे स्वीकार नहीं किया।
प्रशांत किशोर का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पहले वे चुनावी रणनीतिकार के रूप में मशहूर हुए, अब प्रत्यक्ष राजनीति में उतर चुके हैं। जन सुराज के जरिए उन्होंने युवाओं को लुभाने की कोशिश की, लेकिन नतीजे निराशाजनक रहे। एनडीए की शानदार जीत ने विपक्ष को पटखनी दे दी।
यह फैसला न केवल जन सुराज के लिए झटका है, बल्कि उन तमाम दलों के लिए सबक है जो कोर्ट के रास्ते चुनावी हार को उलटना चाहते हैं। बिहार अब विकास और शासन पर ध्यान केंद्रित करेगा। प्रशांत किशोर को अब घास की जड़ों में जाकर मजबूत संगठन खड़ा करना होगा। राजनीति में सफलता धैर्य और जनाधार पर टिकी है।
लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि अदालतें जनता के फैसले का सम्मान करें।