बुजुर्गों के लिए दिमागी फिटनेस का सबसे आसान और सुखद तरीका हो सकता है पोते-पोतियों का ख्याल रखना। प्रतिष्ठित जर्नल साइकोलॉजी एंड एजिंग में छपी रिपोर्ट बताती है कि नाती-पोतों की देखभाल करने वाले दादा-नानी की स्मरणशक्ति और वाणी कौशल गैर-भूमिका निभाने वालों से कहीं बेहतर होता है।
फ्लाविया चेरेचेश द्वारा निर्देशित इस विस्तृत शोध में 50+ आयु के 2887 दादा-दादियों को शामिल किया गया, जिनकी औसत आयु 67 वर्ष थी। 2016-2022 के आंकड़ों से याद रखने की क्षमता, शब्द प्रयोग और भाषा दक्षता का परीक्षण हुआ। देखभालकर्ताओं ने सभी क्षेत्रों में बाजी मारी।
खास यह कि लाभ देखभाल की आवृत्ति या स्वरूप पर निर्भर नहीं। अनियमित सहायता हो या पूर्णकालिक निगरानी, पढ़ाना हो या खेलना—मानसिक फायदा एक समान रहा। वैज्ञानिकों के अनुसार, बच्चों के साथ मेलजोल दिमाग को सक्रिय रखता है और सामाजिक अलगाव रोकता है।
बच्चों की चंचलता से निपटना, उनसे संवाद और रचनात्मक क्रियाएं मस्तिष्क को व्यायाम देती हैं। यह जुड़ाव बुजुर्ग जीवन को अर्थपूर्ण बनाता है, जो डिमेंशिया जैसी समस्याओं से लड़ने में सहायक है।
जैसे-जैसे आबादी बूढ़ी हो रही है, ऐसे पारिवारिक बंधन महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यह अध्ययन सुझाव देता है कि नाना-नानी को पोतों संग जोड़ना न केवल पारिवारिक एकता मजबूत करेगा, बल्कि उनकी मानसिक मजबूती भी सुनिश्चित करेगा।