बांग्लादेश में 12 फरवरी के संसदीय चुनावों से ठीक पहले हिंसा की घंटी बज रही है। भारतीय खुफिया तंत्र ने अपराध व राजनीतिक हिंसा की घटनाओं के आधार पर खतरे की घंटी बजा दी है। संसदीय चुनाव के साथ जनमत संग्रह होने से हिंसा का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
शेख हसीना को सत्ता से हटाने वाले आंदोलन में आईएसआई प्रायोजित जमात-ए-इस्लामी की भूमिका सुस्पष्ट थी। सूत्रों का कहना है कि जमात पूरे दम से चुनाव लड़ रही है, लेकिन हार महसूस होते ही कट्टर तत्वों को आजाद कर अराजकता फैलाएगी।
बीएनपी बनाम जमात की सीधी टक्कर है। बीएनपी की सरकार बनने पर पाकिस्तान का हाथ दिखेगा, क्योंकि यूनुस सरकार ने पाकिस्तानी यात्रियों, व्यापारिककों व हथियार कारोबार को सुगम बनाया। पाकिस्तान भारत-बांग्लादेश निकटता से परहेज कराना चाहता है।
तारिक रहमान की घर वापसी से भारत संबंधों में स्थिरता की आस बनी है, मगर पाकिस्तान को नाराज न करने की चेष्टा भी होगी। खालिदा जिया काल की कड़वाहट याद दिलाती है कि भरोसा सीमित रखें।
जमात सत्ता में आई तो आईएसआई का इशारा उसका संविधान बनेगा। पाकिस्तान इसी के लिए जमात को जिताने को बेताब है। यूनुस के राष्ट्रपति बनने की पैमाने आईएसआई व जमात नेताओं से बातचीत में तय हो चुकी, कई लाभ देकर।
हसीना के बाद आईएसआई ने जमात के दम पर बांग्लादेश में पांव पसार लिया। यूनुस ने जमात बैन हटाया, कट्टरपंथियों को छोड़ा—हिंसा के जरिए माहौल बनाने की चाल।
सर्वे बीएनपी को जमात से आगे बता रहे हैं, जिससे हिंसा पक्की। चुनाव स्थगित कराने की साजिश रच ली गई है। आयोग सुचारू प्रक्रिया पर जोर दे रहा, अधिकारियों को रेफरेंडम ‘हां’ कैंपेन से रोका।
जुलाई चार्टर की मंजूरी से 84 बदलाव अनिवार्य होंगे, जो सत्ता, अदालत, वोटिंग व राज्य ढांचे को नया रूप देंगे—’बंगाली’ हटाकर ‘बांग्लादेशी’। भारत की सीमा ‘बहुत ऊंचे अलर्ट’ पर, पूर्वोत्तर व बंगाल में घुसपैठ रोकने को पेट्रोलिंग तेज, अल्पसंख्यकों पर हमले संभावित।